कब मनाएं देवोत्थान एकादशी, जानिए क्यों किया जाता है तुलसी जी और शालिग्राम का विवाह

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कब मनाएं देवोत्थान एकादशी, जानिए क्यों किया जाता है तुलसी जी और शालिग्राम का विवाह

कब मनाएं देवोत्थान एकादशी, जानिए क्यों किया जाता है तुलसी जी और शालिग्राम का विवाह

प्रत्येक वर्ष की कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी (देवउत्थान) एकादशी के नाम से जाना जाता है। पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार भगवान श्री हरि विष्णु भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को क्षीर सागर में चार महीने की योग निद्रा मे जाकर सो जाते है और कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुनः जागते हैं। इस कारण से इसे हरि प्रबोधिनी एकादशी या देवउठनी एकादशी भी कहा जाता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी देवउठनी या देवउत्थान एकादशी पर भगवान विष्णु की पूरे विधि विधान से पूजा की जाती है।

देवउठनी एकादशी कब है

देवउठनी एकादशी (हरि प्रबोधिनी एकादशी) 25 नवंबर 2020 को मनाई जाएगी। एकादशी तिथि का प्रारंभ 25 नवंबर 2020 को सूर्योदय से पूर्व 2 बजकर 42 मिनट से होगा जो 26 नवंबर 2020 को प्रातः 5 बजकर 10 मिनट तक रहेगी।

देवोत्थान एकादशी पर्व की शुरुआत कैसे हुई

देवोत्थान एकादशी पर्व की शुरुआत कैसे हुई

देवोत्थान एकादशी को लेकर एक पौराणिक कथा भी है जिसमे जालंधर को हराने के लिए भगवान विष्णु ने जालंधर की पत्नी वृंदा के साथ छल किया था। वृंदा ने इस छल के लिए श्री हरि को शिला रूप में परिवर्तित हो जाने का श्राप दिया। श्री हरि तब से शिला रूप में भी रहते हैं और उन्हें शालिग्राम कहा जाता है। इन्ही वृंदा ने अगले जन्म में तुलसी के रूप में जन्म लिया था। भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि बिना तुलसी दल के कभी उनकी पूजा सम्पूर्ण नहीं होगी। जिस प्रकार भगवान शिव के विग्रह के रूप में शिवलिंग की पूजा की जाती है। वैसे ही भगवान विष्णु के विग्रह के रूप में शालिग्राम की पूजा की जाती है।

तुलसी विवाह का महत्व

प्रति वर्ष कार्तिक मास की द्वादशी को तुलसी विवाह उत्सव मनाया जाता है। इसके महत्व के कारण ही इस दिन तुलसी विवाह की परम्परा भी है। इस दिन भगवान शालिग्राम के साथ तुलसी जी का विवाह होता है। इस वर्ष 26 नवंबर को शालिग्राम और तुलसी का विवाह होगा। तुलसी जी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं इसलिए देवता जब जागते हैं, तो सबसे पहली प्रार्थना नारायण भगवान तुलसी की ही सुनते हैं। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान करना।