उत्पन्ना एकादशी से ही क्यों किया जाता है एकादशी व्रत का प्रारंभ,एकादशी के दिन क्या न करें

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उत्त्पन्ना एकादशी से ही क्यों किया जाता है एकादशी व्रत का प्रारंभ,एकादशी के दिन क्या न करें

उत्त्पन्ना एकादशी से ही क्यों किया जाता है एकादशी व्रत का प्रारंभ,एकादशी के दिन क्या न करें

प्रत्येक वर्ष मार्गशीर्ष मास कृष्ण पक्ष की एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है। सभी एकादशियों की तरह ही इस दिन भगवान विष्णु की पूजा उपासना की जाती है। एकादशी का व्रत रखने वाले व्यक्ति को जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है और साथ ही  उसे मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। ऐसा माना जाता है कि उत्पन्ना एकादशी के दिन ही एकादशी माता प्रकट हुई थीं । इस कारण से ही इस दिन को उत्पन्ना एकादशी कहा गया। एकादशी , भगवान विष्णु की एक शक्ति का ही रूप है ।

उत्पन्ना एकादशी तिथि

एकादशी तिथि प्रारम्भ  – 10 दिसम्बर 2020 को दोपहर 12:51

एकादशी तिथि समाप्त – 11 दिसम्बर 2020 को प्रातः 10:04

उत्पन्ना एकादशी का महत्व

ऐसा माना जाता है कि एकादशी व्रत का प्रारंभ उत्पन्ना एकादशी से ही होता है। जो भी व्यक्ति नियमानुसार एकादशी व्रत शुरु करता है उसे उत्पन्ना एकादशी से ही एकादशी व्रत प्रारंभ करना चाहिए। उत्पन्ना एकादशी को सभी एकादशियों का प्रारंभ माना जाता है।

उत्पन्ना एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है साथ ही भगवान की कृपा से मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। एकादशी का व्रत एवं पूजन करने से भगवान विष्णु शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते है। एकादशी का व्रत एवम पूजन करने वाले मनुष्यों को पुण्य की प्राप्ति होती है और किये गए पाप नष्ट होते है। 

एकादशी के दिन क्या न करें

ऐसे लोग जो किसी कारण से एकादशी का व्रत नहीं रखते हैं, उन्हें एकादशी के दिन भोजन में चावल का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा असत्य नही बोलना चाहिए एवं परनिंदा से बचना चाहिए। ऐसा करने मात्र से एकादशी का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। जो व्यक्ति एकादशी के दिन विष्णुसहस्रनाम का पाठ करते है उन पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है।

उत्पन्ना एकादशी की पौराणिक कथाउत्त्पन्ना एकादशी से ही क्यों किया जाता है एकादशी व्रत का प्रारंभ,एकादशी के दिन क्या न करें

 

उत्पन्ना एकादशी की कथा के अनुसार एक मुर नामक असुर के द्वारा देवताओं को युद्ध में पराजित करके स्वर्ग पर कब्जा कर लिया गया था। फिर सभी देवता इस समस्या के समाधान के लिए भगवान विष्णु की शरण मे जाते हैं और सभी देवता भगवान विष्णु से इस समस्या के समाधान के लिए प्राथना करते हैं कि भगवान विष्णु उनको इस असुरों से बचायें। इसके बाद भगवान विष्णु ने सभी देवताओं को इस समस्या के समाधान का आश्वासन दिया।

देवताओं के प्राथना करने पर भगवान विष्णु ने मुर नामक दैत्य को मारने का विचार किया और युद्ध के लिए निकल पड़े। मुर और भगवान विष्णु का युद्ध कई वर्षों तक चलता रहा। लेकिन भगवान विष्णु मुर को पराजित न कर सके। जिसके बाद भगवान विष्णु विश्राम करने के लिए बद्रियाकाश्रम में एक गुफा में चले गए।

वह दैत्य भी भगवान विष्णु के पीछे- पीछे उस गुफा में चला आया और सोचने लगा कि आज में अपने शत्रु का मारकर उस पर भी विजय प्राप्त कर लूंगा। वह जैसे ही उस गुफा में घुसा वैसे ही वहां पर उसे एक सुंदर कन्या दिखाई दी और वह कन्या मुर से युद्ध करने लगी। कन्या और मुर के मध्य युद्ध चलता रहा और इसी कन्या के द्वारा ही मुर दैत्य का प्राणान्त हुआ।

कुछ समय बाद जब भगवान विष्णु अपनी नींद से जागे। उन्होंने देखा कि वह मुर नामक दैत्य तो मरा हुआ है। राक्षस को मरा हुआ देखकर भगवान विष्णु के मन में विचार आया कि इस असुर को किसने मारा होगा तब उस कन्या ने भगवान विष्णु को बताया कि यह असुर आपको मारने के लिए यहां आया था और आपके शरीर से ही उत्पन्न होकर मैने इसका वध किया है। इसके बाद भगवान विष्णु ने उस कन्या को प्रसन्न होकर एकादशी नाम दिया क्योंकि वह कन्या भगवान विष्णु के ही शरीर से ही उत्पन्न हुई थी। इस कारण से ही आज के दिन को उत्पन्ना एकादशी भी कहा जाता है।