कब है वर्ष 2020 की आखिरी पूर्णिमा, कौन है भगवान दत्तात्रेय ? क्यों मनाते है दत्तात्रेय जयंती ?

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कब है वर्ष 2020 की आखिरी मार्गशीर्ष पूर्णिमा, कौन है भगवान दत्तात्रेय क्यों मनाते है दत्तात्रेय जयंती

प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की आखिरी तिथि को पूर्णिमा तिथि कहा जाता हैं। पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पू्र्णिमा तिथि को मार्गशीर्ष पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भाागवत गीता में अर्जुन को स्वयं कहा है कि सभी मासों में मार्गशीर्ष मास वो स्वयं हैं। मार्गशीर्ष मास में स्नान, दान और साधना का विशेष महत्व होता है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा के दिन विधि-विधान से पूजा और व्रत करने से पाप और कष्टों से मुक्ति मिलती है और पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान दत्तात्रेय जी की जयंती भी मनाई जाती है।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा

मार्गशीर्ष पूर्णिमा कब है

पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 29 दिसंबर 2020 को सुबह 07 बजकर 54 मिनट पर होगा और पूर्णिमा तिथि समाप्त 30 दिसंबर 2020 को सुबह 08 बजकर 57 मिनट पर होगी।

मार्गशीर्ष पूर्णिमा का महत्व

ज्योतिष विज्ञान की दृष्टि से मार्गशीर्ष पूर्णिमा महत्वपूर्ण तिथि है। पूर्णिमा को सूर्य और चंद्रमा ठीक आमने-सामने होते हैं। पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा से आ रही समस्याओं के उपाय करना बेहद लाभकारी सिद्ध होता है।

दत्तात्रेय जयंती का महत्व

मार्गशीष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को दत्तात्रेय जयंती के रूप मे मनाया जाता है। भगवान दत्तात्रेय जी ऋषि अत्रि और देवी अनुसूया के ही पुत्र हैं। भगवान दत्तात्रेय जी को भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव का ही अवतार रूप माना जाता है।

भगवान दत्तात्रेय का जन्म मार्गशीष मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को प्रदोष काल में माना जाता है। मार्गशीर्ष पूर्णिमा के अवसर पर भगवान दत्तात्रेय की विशेष पूजा उपासना की जाती है एवं उनकी जयंती बड़ी ही धूमधाम से मनाई जाती है।

दत्तात्रेय जयंती की कथा

 

दत्तात्रेय जयंती की कथा

भगवान दत्तात्रेय ऋषि अत्रि और अनुसुइया जी के पुत्र हैं। एक बार तीनो देवियो के मन में अहंकार की भावना आ गई कि उनके जैसी पतिव्रता कोई और नही है। इन्ही तीनो देवियो का गर्व दूर करने के लिए नारद जी तीनो के पास जाकर देवी अनुसुइया की प्रशंसा करने लगे। इसके बाद देवियो ने त्रिदेवों से आग्रह किया कि अनुसुइया जी के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने को कहा और त्रिदेव भी देवी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती जी की बात मान ली।

त्रिदेव साधु के वेश में अनुसुइया की परीक्षा लेने पहुंचे। जब देवी अनुसूया इन्हें भिक्षा देने लगी तो इन्होंने मना कर दिया और भोजन करने की इच्छा प्रकट की। देवी अनुसूया ने अतिथि सत्कार को अपना धर्म मानते हुए उनकी बात मान ली और उनके लिए प्रेम भाव से भोजन की थाली परोस लाई। लेकिन तीनों देवों ने भोजन करने से इन्कार करते हुए कहा कि जब तक आप नग्न होकर भोजन नहीं परोसेगी तब तक हम भोजन नहीं करेगें। देवी अनुसूया यह सुनते ही पहले तो स्तब्ध रह गई और गुस्से से भर उठी। लेकिन अपने पतिव्रत धर्म के बल पर उन्होंने तीनो की मंशा जान ली।

अनुसुइया कुछ क्षण के लिए परेशान हुई लेकिन अगले ही क्षण उन्होंने मंत्र पढ़ते हुए तीनों साधुओं पर जल का छिड़काव किया, जिससे वे तीनों बाल रूप में बन गए। इसके बाद अनुसुइया ने उन्हें माता बनकर स्तनपान करवाया। जब अत्रि मुनी आश्रम पहुंचे तो अनुसुइया ने उन्हें सारा किस्सा सुनाया लेकिन ऋषि तो त्रिकालदर्शी थे और सब देख रहे थे प्रभु की लीला।

दत्तात्रेय जयंती की कथा

जब कुछ समय बाद भी ब्रह्मा, विष्णु और महेश घर नहीं लौटे तब तीनों देवियों को अपने पतियों की चिन्ता सताने लगी। देवियों को अपनी भूल पर पछतावा होने लगा। वह तीनों ही माता अनुसूया से क्षमा मांगने लगी। तीनों ने उनके पतिव्रत धर्म के समक्ष अपना सिर झुकाया। माता अनुसूया ने कहा कि इन तीनों ने मेरा दूध पीया है, इसलिए इन्हें बालरुप में ही रहना ही होगा। यह सुनकर तीनों देवों ने अपने-अपने अंश को मिलाकर एक नया अंश पैदा किया। इसका नाम दत्तात्रेय रखा गया। इनके तीन सिर तथा छ: हाथ बने। तीनों देवों को एकसाथ बालरुप में दत्तात्रेय के अंश में पाने के बाद माता अनुसूया ने तीनों देवो को पूर्ववत रुप प्रदान कर दिया।