क्यों मनाया जाता है कुम्भ मेला ? क्या है कुम्भ का महत्त्व ?

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क्यों मनाया जाता है कुम्भ मेला ? क्या है कुम्भ का महत्त्व ?

कुंभ मेला दुनिया के सभी धार्मिक आयोजनों में सबसे बड़ा और प्रचलित आयोजन है। कुंभ का पर्व हर 12 वर्ष के अंतराल पर चार प्रमुख स्थानों पर मनाया जाता है। चार प्रमुख स्थान हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयाग है। ज्योतिष के मुताबिक, जब बृहस्पति कुम्भ राशि में और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, तब कुम्भ मेले का आयोजन किया जाता है। कुंभ का अर्थ है कलश। ज्योतिष में कुम्भ राशि का भी यही चिह्न है। कुंभ मेले की पौराणिक मान्यता समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है।

कुंभ का महत्व

कुंभ मेले में अखाड़ों द्वारा किया जाने वाला शाही स्नान मुख्य आकर्षण का केंद्र होता है। इस शाही स्नान को देखना ही सौभाग्य का विषय है। इस दौरान विभिन्न अखाड़ों की ओर से भव्य झांकी निकाली जाती है। शाही स्नान के समय साधु-संत अपनी अपनी परंपरा अनुसार हाथी, घोड़े या राजसी पालकी में सवार होकर बैंड-बाजे के साथ निकलते हैं। इस दौरान आगे-आगे नागाओं का विशाल झुंड होता है और उसके पीछे महंत, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर और आचार्य महामंडलेश्वर आदि होते हैं।

कुम्भ से संबंधित पौराणिक कथा

कुम्भ से संबंधित पौराणिक कथा

कुंभ के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित भी हैं जो देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है। जब इंद्रादि देवता कमजोर हो गए तो दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया और स्वर्ग पर आधिपत्य स्थापित कर लिया। इसके बाद सभी देवता मिलकर भगवान नारायण के पास गए और उन्हे समस्त वृतान्त सुनाया। तब भगवान विष्णु ने उन्हे दैत्यों के साथ मिलकर समुद्र मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी।

अमृत का नाम सुनने से ही सभी दैत्य भी समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। भगवान विष्णु स्वयं कछुए का रूप लेकर पर्वत के मूल में विराजमान हुए और वासुकि नाग की रस्सी बनाई गई। देव और दानव दोनों मंथन में लग गए। समुद्र मंथन से चौदह वस्तुयें निकली इनमें सबसे अंत में अमृत निकला। अमृत निकलते ही सभी अमृत के पीछे भागने लगे उसे पाने के लिए। जब धन्वंतरि भगवान कलश लेकर निकले तो सभी उनके पीछे पीछे दौड़ पड़े। अमृत कलश के लिए देव दानव मे युद्ध होने लगा। असुरों से अमृत को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने वह पात्र अपने वाहन गरुड़ को दे दिया।

असुरों ने जब गरुड़ से वह पात्र छीनने का प्रयास किया तो इस दौरान पृथ्वी के चार स्थानों (प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन, नासिक) पर कलश से अमृत बूँदें गिरी। तभी से प्रत्येक 12 वर्षों के अंतराल पर इन स्थानों पर कुम्भ मेला आयोजित किया जाता है। देव दानव युद्ध को देखकर भगवान विष्णु ने एक अवतार धारण किया जिसका नाम था मोहिनी अवतार। मोहिनी रूप धारण करके भगवान ने दैत्यों को मोहित कर लिया और अमृत बराबर मात्रा में देव और दैत्यों को पिलाने को कहा। इस प्रकार देव-दानव युद्ध का अंत किया गया और देवताओं को भगवान मोहिनी की कृपा से अमृत प्राप्त करके पुनः स्वर्ग का अधिपत्य प्राप्त किया l